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नागपुरी संस्थान

(शोध एवं प्रशिक्षण केन्द्र)

उद्देश्य

नागपुरी संस्थान कर मूल काम हय नागपुरी भासा, साहित, संस्कृति आउर इतिहास कर खोज आउर प्रकासन। इकर माध्यम से झारखंडी जनगण में अभिनव चेतना कर प्रचार-प्रसार इकर लक्ष्य हय। जाहिर हय कि ई काम प्रशिक्षित टीम के बिना पूरा नइ होवे पारी। से ले, संस्थान में प्रशिक्षण कर भी बेवस्था करल जात हे। .

झारखण्ड का इतिहास

विसेश्वर प्रसाद केशरी

firefox प्राचीनतम गोंडवानालैंड का उत्तरपूर्वी भाग झारखंड के नाम से विख्यात रहा है। प्रागैतिहासिक उपकरणों की लब्धि से प्रमाणित होता है कि यह क्षेत्र प्राचीन प्रस्तर युग से ताम्र युग तक आदिमानव का निवास स्थल था। इस क्षेत्र में अनौपचारिक रूप से जो प्रागैतिहासिक उपकरण और हाल में भित्ति चित्र भी उपलब्ध हुए हैं, उसकी संक्षिप्त सूची रांची गजेटियर 1917 और सिंहभूम जिला गजेटियर 1958 में दर्ज है। इस संबंध में विधिवत सर्वेक्षण किया जाय तो असंभव नहीं कि चौंकाने वाले तथ्य सामने आएंगे।

चौथे नागवंशी नृपति प्रताप राय (326-353 ई) अपनी राजधानी सुतियाम्बे (पिठोरिया) से हटा कर चुटिया ले गये थे और काशी आदि स्थानों से श्रेष्ठ जनों को आमंत्रित कर स्वर्णरेखा नदी के किनारे सुंदर नगर बसाया था।

- वेणीराम महथा,‘नागवंशावली’

नागपुरी भाषा

नागपुरी भी मागधी अपभ्रंश से प्रसूत एक निश्चित बोली है जो बिहारी के अंतर्गत आती है। इसके बीज भी 8वीं-11वीं शताब्दी तक पड़ चुके होंगे और चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी तक वे सारी विशेषताएं इसमें आ गई होंगी, जो आधुनिक नागपुरी में विद्यमान हैं।

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झारखण्ड के सदान

सदानों का प्रारंभिक इतिहास नाग जाति, नाग समुदाय से संपृक्त है। नाग जाति से जुड़े छोटानागपुर के नागवंशी लाल-ठाकुर, पंचेत के गोवंशी शिखर और सुरगुजा के रक्सेल राजाओं ने लगभग 2000 वर्षों तक झारखंड में अविच्छिन राज्य किया। इनके पूर्व बौद्ध-जैन परंपराओं से संबद्ध बहुत सारे लोग इस क्षेत्र में निवास करते थे। जगह-जगह इनके निवासों के प्रतीक-प्रमाण झारखंड में मौजूद हैं।

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